छुक-छुक ट्रेन

छुक-छुक ट्रेन


छुक-छुक ट्रेन चल रही ट्रेन का सफर निराला था
रंग बिरंगे लोग भरे कोई काला तो कोई गोरा था
कौन हिन्दू कौन मुस्लिम अंतर करना मुश्किल था
जग से thrus वाला नींद से हारके पैरों तले ही सोया था
छुक-छुक ट्रेन चल रही ट्रेन का सफर निराला था
रंग बिरंगे लोग भरे कोई काला तो कोई गोरा था

आम आदमी, आम आदमी के साथ ही तो चलता है
इक दूजे के कंधों पर बैठके सफर को पूरा करता है
भ्रष्टाचार से बनी मिठाई तो पैसे वाला चखता है
आम आदमी तो बस उयका बोझ उठाकर चलता है
छुक-छुक ट्रेन चल रही ट्रेन का सफर निराला था
रंग बिरंगे लोग भरे कोई काला तो कोई गोरा था

पैर रखने की जगह न हो तो सफर मुश्किल होता है
सभी जूझ रहे हम भी जूझें यही दिलों मे होता है
धर्म-जात के नाम पर ये सफर एक तमाचा होता है
जब हिन्दू मुस्लिम की गोद मे सिर रखकर के सोता है
छुक-छुक ट्रेन चल रही ट्रेन का सफर निराला था
रंग बिरंगे लोग भरे कोई काला तो कोई गोरा था

छोटे-बड़े न अपने-पराये सभी एक मंजिल के राही
भरे पड़े हैं एक डिब्बे मे मंगल यात्रा यही कहाई
जहाँ-तहाँ बस धक्के खाना आम आदमी की यही कहानी
छुक-छुक करती हुई ट्रेन ने यही कहानी रोज सुनानी
छुक-छुक ट्रेन चल रही ट्रेन का सफर निराला था
रंग बिरंगे लोग भरे कोई काला तो कोई गोरा था

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