आज की शाम

आज की शाम



कुछ खामोश सी है ये शाम, मानो एक नन्हा सा बच्चा जिसे कुछ अजनबी लोगों के बीच मे बिठा दिया हो और वो उनको पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि ये लोग कौन हैं, ये अपने हैं या पराये, ये दोस्त हैं या दुष्मन, इनसे बात करूँ या नहीं आखिर मै ये कहाँ आ गया, मेरे घरावाले रिश्तेदार, मेरे यार, मेरा प्यार, मेरे अपने-पराये कहाँ चले गए ?। मै हँस क्यों नहीं पा रहा हूँ ? मै खेल क्यों नहीं पा रहा हूँ ? ये अजीब सी घबराहट क्यों हो रही हे मुझे ?, कहीं ये लोग मुझे नुकसान तो नहीं पहुँचायेंगे ? इसी तरह जब कोई बच्चा अजनबियों के बीच मे घबराने लगता है और हँसता खेलता बच्चा चुप हो जाता है, जाड़े की ये सर्दियों की शामें भी वैसे ही घबराई और शान्त सी होती है जैसे कि किसी से डर रही हों सायद उस काली रात से जो आने वाली है या फिर उस नये सबेरे से जो धूप बनकर आता है और ठण्डक को दूर भगाने की कोशिश करता है। न जाने क्यो घबराई हुई है ये शाम ? न जाने क्यों अपने आप को अकेला सा समझती है और ओंस की बूंदों के रूप मे अपने आँखों मे नमी लाती है जैसे कि इसे कितना दुख हों। ये भी हो सकता है कि धीरे-धीरे उसका अस्तित्व समाप्त हो रहा है और उसे काली रात निगलने वाली है, हो न हो वो इसीलिए डरी-डरी सहमी-सहमी सी है। 

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