तनहाई
तनहाई की रात और एक सपना आया
सायद उससे मिलने का कोई सन्देशा लाया
बस रात भर का साथ था हम दोनों का
सुबह होने पर उसको मैने कहीं भी नहीं पाया
जन्दगी एक मेला है
फिर भी इंसान अकेला है
उसी के पास है जाना इक दिन
जिसने यहाँ धकेला है
पूजा है तो पूजा ही करेंगे
पूजा मिले तो काम न दूजा करेंगे
कर्म ही पूजा का फण्डा मेरी समझ नहीं आता
पूजा के बिना कोई भी कर्म हो ही नहीं पाता
दिन बीतने पर फर्क दिखने लगा
खुशी थी जिसमे वो दिल दुखने लगा
सायद किसी ने कुछ ऐसा जुलम किया
उड़ते हुए पंछी को पिंजरा दिखा दिया
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