एक कोमल सी कली


एक कोमल सी कली


एक कोमल सी कली थी जो कि आगे बढ़ना चाहती थी। आगे बढ़ने के लिए उसने एक दूसरी टहनी का सहारा लेने की कोशिश की लेकिन माली को ये सब पसन्द नहीं आया उसे ऐसा लगा कि वो जो कली दूसरी टहनी के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रही है इससे कई लोगों के रास्ता रूक जाएगा और लोग इन दोनो के मिलन को कभी भी स्वीकार नही करेंगे। यही सोचकर माली ने वो कली उस टहनी से दूर कर दी। जब माली उस कली को उस टहनी से दूर कर रहा था तो वो कली टहनी से चिपकी हुई थी मानो जिन्दगी भर उसी के साथ रहना चाहती हो, मानो उसी के साथ पतझड़ का दुःख और सावन की खुशियाँ बाँटना चाहती हो, जब माली उसे उस टहनी से अलग करने लगा तो मानो उसकी आँखों मे आँसू थे, दिल मे तूफान था, और जिन्दगी मे मानो दर्द का समुन्दर उमड़ आया हो लेकिन माली को उसका वो दर्द देखा नही गया क्योंकि माली का दिल उस कली की तरह कोमल नही था न। उस टहनी को भी उस कली की आदत पड़ गई थी और जब वो उससे दूर जा रही थी तो उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके अपने शरीर का ही हिस्सा कटकर अलग हो रहा हो। कली जो अपना कल उस टहनी के साथ देख रही थी और टहनी जो टहनी को अपने शरीर का हिस्सा समझ बैठा था माली के कठोर फैसले के कारण उन दोनों को अलग होना पड़ जिससे जो कल उन लोगों ने सोचा था उससे बिल्कुल बिपरीत कल उनके सामने आया। इधर ये धप मे तपता रहा और उधर वो अकेली धूप मे तपती। दिन भर धूप मे तपने के बाद दोनों एक दूसरे की तरफ झुकने की कोशिश करते लेकिन लोग उन्हे एक दूसरे की तरफ झुका देख उन्हे फिर से दूर कर देते। दोनो जो एक दूसरे मे सहारा ढूँढ रहे थे अब बेसहारा हो चुके थे। जब वो जी रहे थे या फिर अपनी लासों को खुद ही ढो रहे थे कोई कुछ कह नही सकता। अभी भी वो दोनो अकेले हैं हालांकि जो धूप थी वो थोड़ी कम हो गई है लेकिन आज भी दोनों जीने के लिए किसी वजह या सहारे की तलाश मे है न जाने वो कब पूरी होगी, होगी भी या नही कुछ कह नहीं सकते।

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