ज्ञान-विज्ञान
क्भी-कभी जिन्दगी मे ऐसा भी मोड़ आता है कि इंसान डिसाइड नहीं कर पाता है कि उसे क्या करना है और कैसे करना है इस दुविधा मे अक्सर इंसान भगवान की शरण मे जाता है और उससे आग्रह करता है कि भगवान मुझे सही और गलत का ज्ञान दो और मुझे सही रास्ते पर चलने की शक्ति दो। अक्सर लोग समझते हैं कि मन्दिर जाने का मतलब भगवान की शरण मे जाना होता है जबकि ये बात सत्य नहीं है। दरअसल हम मन्दिर मे इसलिए जाते है ताकि हम अपने अन्दर के भगवान को जगा सके। जो मन्दिर मे बैठा है वो हमारे अन्दर का ही भगवान है बस हम अपने अन्दर के भगवान के प्रति श्रद्धा दिखाते हैं और महसूस करते हैं कि चमत्कार हो रहे हैं वो चमत्कार मन्दिर मे बैठा भगवान नहीं हमारी श्रद्धा ओर भक्ति करती हे जो हमारे अन्दर के अन्धकार को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है और ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। जिसे हम चमत्कार कहते हैं दरअसल वो ज्ञान का ही एक रूप है। कई वर्षों पहले हमारे घरों मे बिजली नहीं हुआ करती थी तो हम लोग दीप जलाकर उजाला करते थे बिजली जैसी किसी चीज को लोग चमत्कार मानते थे, जब वो चमत्कार हो गया तो उसे विज्ञान का नाम दिया गया। उसी प्रकार कई वर्षों पहल इंसान हवा मे उड़ने या उड़ाने को चमत्कार समझता था जब वो चमत्कार हो गया तो उसे भी चमत्कार का नाम दिया गया। मेरा मानना है कि वो वैज्ञानिकों की एकाग्रता का कमाल है जिसे धार्मिक भाषा मे ध्यान कहते हैं। जैसे ध्यान लगाकर ऋषि-मुनि किसी शक्ति को प्राप्त करने की इच्छा करते थे ओर वो शक्ति उन्हे प्राप्त हो जाती थी उसी प्रकार वैज्ञानिक भी कई वर्षों तक किसी एक चीज को प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाते हैं और एक दिन उसका आविष्कार हो जाता है जिसे कहते हैं कि उसकी तपस्या पूर्ण हो गई है और उस तपस्या से मिले वरदार से समस्त मानव जाति का भला होता है।
क्भी-कभी जिन्दगी मे ऐसा भी मोड़ आता है कि इंसान डिसाइड नहीं कर पाता है कि उसे क्या करना है और कैसे करना है इस दुविधा मे अक्सर इंसान भगवान की शरण मे जाता है और उससे आग्रह करता है कि भगवान मुझे सही और गलत का ज्ञान दो और मुझे सही रास्ते पर चलने की शक्ति दो। अक्सर लोग समझते हैं कि मन्दिर जाने का मतलब भगवान की शरण मे जाना होता है जबकि ये बात सत्य नहीं है। दरअसल हम मन्दिर मे इसलिए जाते है ताकि हम अपने अन्दर के भगवान को जगा सके। जो मन्दिर मे बैठा है वो हमारे अन्दर का ही भगवान है बस हम अपने अन्दर के भगवान के प्रति श्रद्धा दिखाते हैं और महसूस करते हैं कि चमत्कार हो रहे हैं वो चमत्कार मन्दिर मे बैठा भगवान नहीं हमारी श्रद्धा ओर भक्ति करती हे जो हमारे अन्दर के अन्धकार को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है और ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। जिसे हम चमत्कार कहते हैं दरअसल वो ज्ञान का ही एक रूप है। कई वर्षों पहले हमारे घरों मे बिजली नहीं हुआ करती थी तो हम लोग दीप जलाकर उजाला करते थे बिजली जैसी किसी चीज को लोग चमत्कार मानते थे, जब वो चमत्कार हो गया तो उसे विज्ञान का नाम दिया गया। उसी प्रकार कई वर्षों पहल इंसान हवा मे उड़ने या उड़ाने को चमत्कार समझता था जब वो चमत्कार हो गया तो उसे भी चमत्कार का नाम दिया गया। मेरा मानना है कि वो वैज्ञानिकों की एकाग्रता का कमाल है जिसे धार्मिक भाषा मे ध्यान कहते हैं। जैसे ध्यान लगाकर ऋषि-मुनि किसी शक्ति को प्राप्त करने की इच्छा करते थे ओर वो शक्ति उन्हे प्राप्त हो जाती थी उसी प्रकार वैज्ञानिक भी कई वर्षों तक किसी एक चीज को प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाते हैं और एक दिन उसका आविष्कार हो जाता है जिसे कहते हैं कि उसकी तपस्या पूर्ण हो गई है और उस तपस्या से मिले वरदार से समस्त मानव जाति का भला होता है।
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