श्रम और पुरस्कार
अर्थशास्त्र के अनुसार श्रम और पुरस्कार का अनुपात सही होना चाहिए नही तो इसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। कोई श्रमिक श्रम इसलिए नहीं करता क्योंकि उसे श्रम की आवश्यकता है कोई व्यक्ति इसलिए श्रम करता है क्योंकि उससे उसकी जीविका चलती है उसके परिवार की जीविका चलती है। श्रम के अनुसार ही उसे पुरस्कार दिया जाता है जो कि उसकी और उसके परिवार की जीविका का श्रोत होती है। यदि श्रम ज्यादा है और पुरस्कार की मात्रा कम है तो अर्थव्यवस्था चिरमिरा जाती है, मान लो एक व्यक्ति 12 घण्टे मजदूरी करता है और इसके बदले उसे 5000रू मिलते हैं जिससे वो अपने और अपने परिवार के 5 सदस्ययों का पालन पोषण करता है। पाँच लोगों मे 3 बच्चे हैं जो कि स्कूल जाते हैं और दो पति-पत्नी। बच्चों के स्कूल का खर्चा उन्हीं 5 हजार रूपयों मे चलता है। पत्नी का खाना-पीना, पहनना, साज श्रृंगार भी उन्हीं 5 हजार रूपयों पर निर्भर करता है, जो व्यक्ति श्रमिक है उसका खर्चा भी उन्ही 5 हजार रूपयों से चलता है। अब इतने सारे खर्चे होने पर भी उसकी आय सीमित है जबकि वो समय से ज्यादा काम कर रहा है पर आय मे कोई भी वृद्धि नही है। ऐंसे मे क्या होगा कि वो अपने खान पान मे कटौती करेगा, अपने बच्चों की जरूरतों मे कटौती करेगा, अपनी पत्नी की जरूरतों मे कटौती करेगा क्योंकि इसके अलावा उसके पास और कोई उपाय नही बचता। और चीजों मे कटौती करता है तो इसमे चलेगा लेकिन यदि वो अपने खान पान, शारीरिक आराम मे कटौती करेगा तो फिर ये उसके लिए और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा। मान लो वो जितना परिश्रम करता है उसके लिए उसे दिन भर मे 15 रोटियों की आवश्यकता पड़ती है लेकिन सीमित आय होने के कारण वो 15 रोटियों की जगह केवल 10 रोटियाँ ही खा पाता है तो 5 रोटियों की कमी के कारण उसके शरीर मे कई पोषक तत्वों की कमी आ जाएगी और वही उसके रोग का कारण बनेगी। एक तो पहले से ही आय कम है, ऊपर से खाने को रोटी पेट भर नही है और ऊपर से बीमारी लग गई, अब क्या करेगा, बीमारी को दूर भगाने के लिए श्रम छोड़ना पड़ेगा, अब जो 5 हजार रूपये मिल रही थी वो भी नही मिलेंगी, श्रम छोड़ देगा तो फिर बीमारी का इलाज कैसे कर पायेगा, उसके लिए उसे यार दोस्तों से कर्जा लेना पड़ेगा। अब कर्जा लेकर इलाज करवा भी दिया तो फिर वो कर्जा कैसे चुकाएगा इसी चिन्ता मे और बीमार हो जाएगा, पहले वो शारीरिक रूप से बीमार था अब मानसिक रूप से हो जाएगा। कहते हैं कि चिन्ता चिता के समान होती है और यही चिन्ता एक दिन उसकी चिता बन जाएगी। भारत मे ऐंसे कई उदाहरण है जो उपरोक्त घटना को दोहराते है। आय दिन हम लोग अखबार और टीवी मे देखते रहते हैं कि कर्जे मे डूबे किसान ने आत्म हत्या की, तो वो किसान इसी तरह मानसिक रोग से पीड़ित हो जाता है क्योंकि हमारे देश का खोखला सिस्टम उसे इतना मजबूर करता है कि वो जीने की आस खो देता है और आत्महत्या कर देता है। अब ये तो हुई बात कि जिसको श्रम के हिसाब से कम आय प्राप्त हुई उससे अर्थव्यवस्था मे किस तरह का परिवर्तन आता है या फिर उस श्रमिक का क्या हाल हाता है। अब मान लो एक श्रमिक 6 घण्टे काम करता है और उसके बदले मे उसे 1,50,000रू मिलते हैं। इससे अर्थव्यवस्था मे किस तरह का परिवर्तन आयेगा ?। इससे ये परिवर्तन आयेगा कि हर व्यक्ति इसी तरह की आय के पीछे भागेगा न कि काम के। उन्हे निकम्मेपन की आदत पड़ जायेगी। ये अपनी आय का दुरूप्योग करेंगे, शाराब पियेंगे, डिस्को जायेंगे, महंगे शौक पालेंगे जबकि इससे तीन गुना ज्यादा श्रम करने वाला बेचारा आदमी काम करने की वजह से दम तोड़ देता है और ये जो कि 6 घण्टे भी काम नही करते वो अय्यासी की मौत मर जाते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था मे सुधार की आवश्यकता है। यहाँ श्रम के बदले मे जो पुरस्कार मिलता है उसके वितरण मे बहुत अधिक भिन्नता देखी जाती है जो कि यहाँ की अर्थव्यवस्था के लिए तो घातक है ही बल्कि मनुष्य जाति के लिए भी घातक है क्योंकि जब किसी को खाने को कुछ नही मिलेगा तो वो लोग एक दूसरे को खाना शुरू कर देंगे और वही दिन भारत वर्ष के पतन का दिन होगा।
जय हिन्द।
जय हिन्द।
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